Thursday, 26 October 2017

छठ पूजा - GNCT BLOG






छठ हिंदू त्यौहार है जो हर साल लोगों द्वारा बहुत उत्सुकता के साथ मनाया जाता है। ये हिंदू धर्म का बहुत प्राचीन त्यौहार है, जो ऊर्जा के परमेश्वर के लिए समर्पित है जिन्हें सूर्य या सूर्य षष्ठी के रूप में भी जाना जाता है। लोग पृथ्वी पर हमेशा के लिये जीवन का आशीर्वाद पाने के लिए भगवान सूर्य को धन्यवाद देने के लिये ये त्यौहार मनाते हैं। लोग बहुत उत्साह से भगवान सूर्य की पूजा करते हैं और अपने परिवार के सदस्यों, दोस्तों और बुजुर्गों के अच्छे के लिये सफलता और प्रगति के लिए प्रार्थना करते हैं। हिंदू धर्म के अनुसार सूर्य की पूजा कुछ श्रेणी रोगों के इलाज से संबंधित है जैसे कुष्ठ रोग आदि।

इस दिन जल्दी उठकर पवित्र गंगा में नहाकर पूरे दिन उपवास रखने का रिवाज है, यहाँ तक कि वो पानी भी नहीं पीते और एक लम्बे समय तक पानी में खड़े रहते हैं। वो उगते हुये सूर्य को प्रसाद और अर्घ्य देते हैं। ये भारत के विभिन्न राज्यों में मनाया जाता है, जैसे: बिहार, यू.पी., झारखण्ड और नेपाल। हिन्दू कलैण्डर के अनुसार, ये कार्तिक महाने (अक्टूबर और नवम्बर महीने में ) के छठे दिन मनाया जाता है।
कुछ स्थानों पर चैत्री छठ चैत्र के महीने (मार्च और अप्रैल) में होली के कुछ दिन बाद मनाया जाता है। इसका नाम छठ इसलिये पड़ा क्योंकि ये कार्तिक महीने के छठे दिन मनाया जाता है। छठ पूजा देहरी-ओन-सोने, पटना, देव और गया में बहुत प्रसिद्ध है। अब ये पूरे भारत में मनाया जाता है।

2017 में छठ पूजा की तारीख

  • मंगलवार, 24 अक्टूबर 2017, स्नान और खाने का दिन है।
  • बुद्धवार, 25 अक्टूबर , 2017 उपवास का दिन है जो 36 घंटे के उपवास के बाद सूर्यास्त के बाद समाप्त हो जाता है।
  • गुरुवार, 26 अक्टूबर , 2017 संध्या अर्घ्य का दिन है जो की संध्या पूजन के रूप में जाना जाता।
  • शुक्रवार, 27 अक्टूबर 2017 सूर्योदय अर्घ्य और पारान या उपवास के खोलने का दिन है।

छठ पूजा का इतिहास और उत्पत्ति

छठ पूजा हिन्दू धर्म में बहुत महत्व रखती है और ऐसी धारणा है कि राजा (कौन से राजा) द्वारा पुराने पुरोहितों से आने और भगवान सूर्य की परंपरागत पूजा करने के लिये अनुरोध किया गया था। उन्होनें प्राचीन ऋगवेद से मंत्रों और स्त्रोतों का पाठ करके सूर्य भगवान की पूजा की। प्राचीन छठ पूजा हस्तिनापुर (नई दिल्ली) के पांडवों और द्रौपदी के द्वारा अपनी समस्याओं को हल करने और अपने राज्य को वापस पाने के लिये की गयी थी।
ये भी माना जाता है कि छठ पूजा सूर्य पुत्र कर्ण के द्वारा शुरु की गयी थी। वो महाभारत युद्ध के दौरान महान योद्धा था और अंगदेश (बिहार का मुंगेर जिला) का शासक था।
छठ पूजा के दिन छठी मैया (भगवान सूर्य की पत्नी) की भी पूजा की जाती है, छठी मैया को वेदों में ऊषा के नाम से भी जाना जाता है। ऊषा का अर्थ है सुबह (दिन की पहली किरण)। लोग अपनी परेशानियों को दूर करने के साथ ही साथ मोक्ष या मुक्ति पाने के लिए छठी मैया से प्रार्थना करते हैं।
छठ पूजा मनाने के पीछे दूसरी ऐतिहासिक कथा भगवान राम की है। यह माना जाता है कि 14 वर्ष के वनवास के बाद जब भगवान राम और माता सीता ने अयोध्या वापस आकर राज्यभिषेक के दौरान उपवास रखकर कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष में भगवान सूर्य की पूजा की थी। उसी समय से, छठ पूजा हिन्दू धर्म का महत्वपूर्ण और परंपरागत त्यौहार बन गया और लोगों ने उसी तिथि को हर साल मनाना शुरु कर दिया।

छठ पूजा कथा

बहुत समय पहले, एक राजा था जिसका नाम प्रियब्रत था और उसकी पत्नी मालिनी थी। वे बहुत खुशी से रहते थे किन्तु इनके जीवन में एक बहुत बचा दुःख था कि इनके कोई संतान नहीं थी। उन्होंने महर्षि कश्यप की मदद से सन्तान प्राप्ति के आशीर्वाद के लिये बहुत बडा यज्ञ करने का निश्चय किया। यज्ञ के प्रभाव के कारण उनकी पत्नी गर्भवती हो गयी। किन्तु 9 महीने के बाद उन्होंने मरे हुये बच्चे को जन्म दिया। राजा बहुत दुखी हुआ और उसने आत्महत्या करने का निश्चय किया।
अचानक आत्महत्या करने के दौरान उसके सामने एक देवी प्रकट हुयी। देवी ने कहा, मैं देवी छठी हूँ और जो भी कोई मेरी पूजा शुद्ध मन और आत्मा से करता है वह सन्तान अवश्य प्राप्त करता है। राजा प्रियब्रत ने वैसा ही किया और उसे देवी के आशीर्वाद स्वरुप सुन्दर और प्यारी संतान की प्राप्ति हुई। तभी से लोगों ने छठ पूजा को मनाना शुरु कर दिया।

छठ पूजा की परंपरा और रीति-रिवाज

यह माना जाता है कि छठ पूजा करने वाला व्यक्ति पवित्र स्नान लेने के बाद संयम की अवधि के 4 दिनों तक अपने मुख्य परिवार से अलग हो जाता है। पूरी अवधि के दौरान वह शुद्ध भावना के साथ एक कंबल के साथ फर्श पर सोता है। सामान्यतः यह माना जाता है कि यदि एक बार किसी परिवार नें छठ पूजा शुरु कर दी तो उन्हें और उनकी अगली पीढी को भी इस पूजा को प्रतिवर्ष करना पडेगा और इसे तभी छोडा जा सकता है जब उस वर्ष परिवार में किसी की मृत्यु हो गयी हो।
भक्त छठ पर मिठाई, खीर, थेकुआ और फल सहित छोटी बांस की टोकरी में सूर्य को प्रसाद अर्पण करते है। प्रसाद शुद्धता बनाये रखने के लिये बिना नमक, प्याज और लहसुन के तैयार किया जाता है। यह 4 दिन का त्यौहार है जो शामिल करता है:
  • पहले दिन भक्त जल्दी सुबह गंगा के पवित्र जल में स्नान करते है और अपने घर प्रसाद तैयार करने के लिये कुछ जल घऱ भी लेकर आते है। इस दिन घर और घर के आसपास साफ-सफाई होनी चाहिये। वे एक वक्त का खाना लेते है, जिसे कद्दू-भात के रुप में जाना जाता है जो केवल मिट्टी के स्टोव (चूल्हे) पर आम की लकडियों का प्रयोग करके ताँबे या मिट्टी के बर्तन में बनाया जाता है।
  • दूसरे दिन (छठ से एक दिन पहले) पंचमी को, भक्त पूरे दिन उपवास रखते है और शाम को पृथ्वी (धरती) की पूजा के बाद सूर्य अस्त के बाद व्रत खोलते है। वे पूजा में खीर, पूरी, और फल अर्पित करते है। शाम को खाना खाने के बाद, वे बिना पानी पियें 36 घण्टे का उपवास रखते है।
  • तीसरे दिन (छठ वाले दिन) वे नदी के किनारे घाट पर संध्या अर्घ्य देते है। अर्घ्य देने के बाद वे पीले रंग की साडी पहनती है। परिवार के अन्य सदस्य पूजा से आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए इंतजार करते हैं। छठ की रात कोसी पर पाँच गन्नों से कवर मिट्टी के दीये जलाकर पारम्परिक कार्यक्रम मनाया जाता है। पाँच गन्ने पंचतत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) को प्रर्दशित करते है जिससे मानव शरीर का निर्माण करते है।
  • चौथे दिन की सुबह (पारुन), भक्त अपने परिवार और मित्रों के साथ गंगा नदी के किनारे बिहानिया अर्घ्य अर्पित करते है। भक्त छठ प्रसाद खाकर व्रत खोलते है।

छठ पूजा के चरण

छठ पूजा की छह महान चरण हैं जो है:
  • यह माना जाता है कि त्यौहार पर उपवास और शरीर की साफ-सफाई तन और मन को विषले तत्वो से दूर करके लौकिक सूर्य ऊर्जा को स्वीकार करने के लिये किये जाते है।
  • आधे शरीर को पानी में डुबोकर खडे होने से शरीर से ऊर्जा के निकास को कम करने के साथ ही सुषुम्ना को उन्नत करके प्राणों को सुगम करता है।
  • तब लौकिक सूर्य ऊर्जा रेटिना और ऑप्टिक नसों द्वारा पीनियल, पीयूष और हाइपोथेलेमस ग्रंथियों (त्रिवेणी परिसर के रूप में जाना जाता है) में जगह लेती है।
  • चौथे चरण में त्रिवेणी परिसर सक्रिय हो जाता है।
  • त्रिवेणी परिसर की सक्रियता के बाद, रीढ़ की हड्डी का ध्रुवीकरण हो जाता है और भक्त का शरीर एक लौकिक बिजलीघर में बदल जाता है और कुंडलिनी शक्ति प्राप्त हो जाती है।
  • इस अवस्था में भक्त पूरी तरह से मार्गदर्शन करने, पुनरावृत्ति करने और पूरे ब्रह्मांड में ऊर्जा पर पारित करने में सक्षम हो जाता है।

छठ पूजा की प्रक्रियाओं के लाभ

  • यह शरीर और मन के शुद्धिकरण का तरीका है जो जैव रासायनिक परिवर्तन का नेतृत्व करता है।
  • शुद्धिकरण के द्वारा प्राणों के प्रभाव को नियंत्रित करने के साथ ही अधिक ऊर्जावान होना संभव है। यह त्वचा की रुपरेखा में सुधार करता है, बेहतर दृष्टि विकसित करता है और उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को धीमा करता है।

छठ पूजा के लाभ

  • छठ पूजा के भक्त शरीर की प्रतिरोधक क्षमता में सुधार कर सकते हैं।
  • विभिन्न प्रकार के त्वचा सम्बन्धी रोगो को सुरक्षित सूरज की किरणों के माध्यम से ठीक किया जा सकता है।
  • यह श्वेत रक्त कणिकाओं की कार्यप्रणाली में सुधार करके रक्त की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढाता है।
  • सौर ऊर्जा हार्मोन के स्राव को नियंत्रित करने की शक्ति प्रदान करती है।
रोज सूर्य ध्यान शरीर और मन को आराम देता है। प्राणायाम, योगा और ध्यान क्रिया भी शरीर और मन को नियंत्रित करने के तरीके है। तीर्थयात्री गंगा नदी के तट पर एक शांतिपूर्ण योग और ध्यान के लिए वाराणसी में आते है।

छठ पूजा का महत्व

छठ पूजा का सूर्योदय और सूर्यास्त के दौरान एक विशेष महत्व है। सूर्योदय और सूर्यास्त का समय दिन का सबसे महत्वपूर्ण समय है जिसके दौरान एक मानव शरीर को सुरक्षित रूप से बिना किसी नुकसान के सौर ऊर्जा प्राप्त हो सकती हैं। यही कारण है कि छठ महोत्सव में सूर्य को संध्या अर्घ्य और विहानिया अर्घ्य देने का एक मिथक है। इस अवधि के दौरान सौर ऊर्जा में पराबैंगनी विकिरण का स्तर कम होता है तो यह मानव शरीर के लिए सुरक्षित है। लोग पृथ्वी पर जीवन को जारी रखने के साथ-साथ आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए भगवान सूर्य का शुक्रिया अदा करने के लिये छठ पूजा करते हैं।
छठ पूजा का अनुष्ठान, (शरीर और मन शुद्धिकरण द्वारा) मानसिक शांति प्रदान करता है, ऊर्जा का स्तर और प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है, जलन क्रोध की आवृत्ति, साथ ही नकारात्मक भावनाओं को बहुत कम कर देता है। यह भी माना जाता है कि छठ पूजा प्रक्रिया के उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को धीमा करने में मदद करता है। इस तरह की मान्यताऍ और रीति-रिवाज छठ अनुष्ठान को हिंदू धर्म में सबसे महत्वपूर्ण त्यौहार बनाते हैं।



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Tuesday, 17 October 2017

दीपावली - 2017 (GNCT Blog)




दीपावली, भारत में हिन्दुओं द्वारा मनाया जाने वाला सबसे बड़ा त्योहार है। दीपों का खास पर्व होने के कारण इसे दीपावली या दिवाली नाम दिया गया। दीपावली का मतलब होता है, दीपों की अवली यानि पंक्ति। इस प्रकार दीपों की पंक्तियों से सुसज्ज‍ित इस त्योहार को दीपावली कहा जाता है। कार्तिक माह की अमावस्या को मनाया जाने वाला यह महापर्व, अंधेरी रात को असंख्य दीपों की रौशनी से प्रकाशमय कर देता है।  
दीप जलाने की प्रथा के पीछे अलग-अलग कारण या कहानियां हैं। हिंदू मान्यताओं में राम भक्तों के अनुसार कार्तिक अमावस्या को भगवान श्री रामचंद्रजी चौदह वर्ष का वनवास काटकर तथा असुरी वृत्तियों के प्रतीक रावणादि का संहार करके अयोध्या लौटे थे।  
तब अयोध्यावासियों ने राम के राज्यारोहण पर दीपमालाएं जलाकर महोत्सव मनाया था। इसीलिए दीपावली हिंदुओं के प्रमुख त्योहारों में से एक है। कृष्ण भक्तिधारा के लोगों का मत है कि इस दिन भगवान श्री कृष्ण ने अत्याचारी राजा नरकासुर का वध किया था। इस नृशंस राक्षस के वध से जनता में अपार हर्ष फैल गया और प्रसन्नता से भरे लोगों ने घी के दीए जलाए। एक पौराणिक कथा के अनुसार विंष्णु ने नरसिंह रुप धारणकर हिरण्यकश्यप का वध किया था तथा इसी दिन समुद्रमंथन के पश्चात लक्ष्मी व धन्वंतरि प्रकट हुए।


दिवाली का महत्व

आज प्रकाश का त्यौहार है। दीवाली का मतलब है प्रकाश का त्यौहार। आप में से हर कोई अपने आप में एक प्रकाश है। यह त्यौहार सारे भारत, नेपाल, सिंगापोर, मलेसिया, श्री लंका, इंडोनेसिया, मारीशस, सूरीनाम, त्रिनिदाद और दक्षिण अफ्रीका में मनाया जाता है। लोग एक दूसरे को दिवाली की शुभ कामनाएं देते हैं और मिठाइयाँ बाँटते हैं। दिवाली के समय हम अतीत के सारे दुःख भूल जाते हैं। जो कुछ भी दिमाग में भरा पड़ा हो, आप पटाखे चलाते हो और सब भूल जाते हो। पटाखों की तरह अतीत भी चला जाता है,सब जल जाता है और मन नया बन जाता है। यही दिवाली है।
एक मोमबत्ती पर्याप्त नहीं है। हर किसी को खुश और प्रकाशित होना होगा। हर किसी को खुश और बुद्धिमान होना होगा। बुद्धिमता का प्रकाश प्रज्वलित हो चुका है। रोशनी को ज्ञान का द्योतक मानते हुए हम ज्ञान रूपी प्रकाश करते है, और आज उत्सव मनाते हैं। आप क्या कहते हो?


अतीत को जाने दो, भूल जाओ। जीवन का उत्सव बुद्धिमता से मनाओ। बुद्धिमता के बिना वास्तव में उत्सव नहीं मनाया जा सकता। बुद्धिमता यह जान लेना है कि ईश्वर मेरे साथ है। आज के दिन हम सब के पास जो भी सम्पति है उसे देखो। याद रखो आप के पास बहुत सारी सम्पति है और पूर्णता महसूस करो। नहीं तो मन हमेशा कमी में ही रहेगा, "ओह यह नहीं है.... वो नहीं है, इसके लिए दुखी, उसके लिए दुखी।" कमी की ओर से प्रचुरता की ओर बढ़ो। प्राचीन पद्वति है कि अपने सामने सभी सोने चांदी के सिक्के रखे जाते हैं, आप अपनी सारी सम्पति सामने रखते हो और कहते हो, "देखो भगवान ने मुझे इतना सब दिया है। मैं बहुत आभारी हूँ।" बाईबल में कहा गया है जिनके पास है उन्हें और मिलेगा, और जिनके पास नहीं है, जो भी थोड़ा बहुत है वो भी ले लिया जायेगा। उसकी प्रचुरता महसूस करो। तब आपको पता चलेगा आपको बहुत दिया गया है।
तब हम लक्ष्मी पूजा करते हैं। धन और एश्वर्य की देवी लक्ष्मी की पूजा की जाती है, और गणेश - चेतना का आवेग जो हमारे रास्ते के सारे विघ्न हर लेते है - यह जप आज के दिन किया जाता है।


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Wednesday, 11 October 2017

विश्व के सबसे सुप्रसिद्ध और ऐतिहासिक आदर्श पत्र में से एक (चिट्ठी) (GNCT Blog)

Abraham Lincoln letter to his son’s teacher in Hindi

“अब्राहम लिंकन का पत्र……. पुत्र के शिक्षक के नाम…”

अब्राहम लिंकन अमेरिका के सोलहवें राष्ट्रपति थे। उन्होने अमेरिका को उसके सबसे बड़े संकट गृहयुद्ध (अमेरिकी गृहयुद्ध) से पार लगाया। अमेरिका में दास प्रथा के अंत का श्रेय लिंकन को ही जाता है इन्हें गुलामों का मुक्तिदाता भी कहा जाता है। लिंकन प्रारंभ से ही मेहनती, सरल स्वभाव के और बुद्धिमान थे। आजीविका चलाने और पढ़ाई के लिए उन्हें शुरू से ही काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा।
राष्ट्रपति लिंकन ने यह पत्र अपने बेटे के स्कूल प्रिंसिपल को लिखा था, यह पत्र एक ऐतिहासिक दस्तावेज है। लिंकन ने इसमें वे तमाम बातें लिखी थीं जो वे अपने बेटे को सिखाना चाहते थे। इस पत्र को आदर्श शिक्षक होने की कसौटी की नजीर के रूप में सालों से प्रस्तुत किया जाता रहा है। यह केवल एक छात्र व शिक्षक के सीखने-सिखाने तक सीमित नहीं हैं बल्कि इसका दायरा बहुत बड़ा है। पढि़ए…
सम्माननीय महोदय,
मैं अपने पुत्र को शिक्षा के लिए आपके हाथों सौंप रहा हूँ। आपसे मेरी अपेक्षा यह है कि इसे ऐसी शिक्षा दें जिससे यह सच्चा इंसान बन सके।
मैं जानता हूँ कि इस दुनिया में सारे लोग अच्छे और सच्चे नहीं हैं। यह बात मेरे बेटे को भी सीखनी होगी पर मैं चाहता हूँ कि आप उसे यह भी बताएँ कि हर बुरे आदमी के पास भी अच्छा हृदय होता है। हर स्वार्थी नेता के अंदर अच्छा लीडर बनने की क्षमता होती है। मैं चाहता हूँ कि आप उसे सिखाएँ कि हर दुश्मन के अंदर एक दोस्त बनने की संभावना भी होती है। ये बातें सीखने में उसे समय लगेगा, मैं जानता हूँ। पर आप उसे सिखाइए कि मेहनत से कमाया गया एक रुपया, सड़क पर मिलने वाले पाँच रुपए के नोट से ज्यादा कीमती होता है।
आप उसे बताइएगा कि दूसरों से जलन की भावना अपने मन में ना लाएँ। साथ ही यह भी कि खुलकर हँसते हुए भी शालीनता बरतना कितना जरूरी है। मुझे उम्मीद है कि आप उसे बता पाएँगे कि दूसरों को धमकाना और डराना कोई अच्छी बात नहीं है। यह काम करने से उसे दूर रहना चाहिए।
आप उसे किताबें पढ़ने के लिए तो कहिएगा ही, पर साथ ही उसे आकाश में उड़ते पक्षियों को धूप, धूप में हरे-भरे मैदानों में खिले-फूलों पर मँडराती तितलियों को निहारने की याद भी दिलाते रहिएगा। मैं समझता हूँ कि ये बातें उसके लिए ज्यादा काम की हैं।
मैं मानता हूँ कि स्कूल के दिनों में ही उसे यह बात भी सीखना होगी कि नकल करके पास होने से फेल होना अच्छा है। किसी बात पर चाहे दूसरे उसे गलत कहें, पर अपनी सच्ची बात पर कायम रहने का हुनर उसमें होना चाहिए। दयालु लोगों के साथ नम्रता से पेश आना और बुरे लोगों के साथ सख्ती से पेश आना चाहिए। दूसरों की सारी बातें सुनने के बाद उसमें से काम की चीजों का चुनाव उसे इन्हीं दिनों में सीखना होगा।
आप उसे बताना मत भूलिएगा कि उदासी को किस तरह प्रसन्नता में बदला जा सकता है। और उसे यह भी बताइएगा कि जब कभी रोने का मन करे तो रोने में शर्म बिल्कुल ना करे। मेरा सोचना है कि उसे खुद पर विश्वास होना चाहिए और दूसरों पर भी। तभी तो वह एक अच्छा इंसान बन पाएगा।
ये बातें बड़ी हैं और लंबी भी। पर आप इनमें से जितना भी उसे बता पाएँ उतना उसके लिए अच्छा होगा। फिर अभी मेरा बेटा बहुत छोटा है और बहुत प्यारा भी।
आपका,
अब्राहम लिंकन


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Wednesday, 4 October 2017

जी.एन. सी.टी.में आयोजित दो दिवसीय गौतमबुद्ध युवा संसद







जी.इन.सी.टी. ग्रेटर नोएडा में आयोजित दो दिवसीय गौतमबुद्ध संसद का समापन जिसमे देश भर के 51 संस्थानों से 300 छात्र छात्राओं ने युवा संसद में भाग लिया। महिला सुरक्षा, तीन तलाक, gst, नोटेबन्दी, रोमियो स्क्वाड आदि विषयों पर गहन चर्चा हुई ।
इस अवसर पर मुख्य अतिथि जेवर बिधायक श्री धीरेंद्र सिंह ने संसदीय कमेटियों के कार्यवाही का निरीक्षण किया साथ ही प्रतियोगिओ के द्वारा विभिन्न पेर दिए जारहे विचारो को प्रोत्साहित करते हुए कई सुझाव दिए तथा उनके द्वारा दिये गए विवेचओ कि प्रशांसा की।उसके पश्चात निदेशक डॉ राजेश पाठक ने उन्हें प्रतीक चिन्ह और गुलदस्ता देकर उनका अभिवादन किया गया।

समापन समारोह में मे विशेष अतिथि वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक गौतमबुद्ध नगर श्री लव कुमार एवम पुलिस अधीक्षक (ग्रामीण) सूश्री सुनीति सिंह ने लोगो से खुद के अंदर बदलाव लाने के लिए प्रेरित किया साथ पुलिस द्वारा किये जारहे सुरक्षा के उपायों का विस्तार से प्रकाश डाला और लोगों को पुलिस द्वारा निरंतर सहयोग का वादा किया।सुश्री सुनीति सिंह ने औरतो के देश की विकास में योगदान और  सशक्त महिला होने से समाज पर उसके अच्छे परिणाम की विवेचना किया।
ततपशचात वरिष्ठ राजनीतिक विचारक श्री शेर सिंह ने जनता और नेता के दोनों की जिम्मेदारियों को समझाया।

निदेशक डॉ राजेश पाठक ने परिभागियों द्वारा विभिन्न विषयों पे ईमानदारी से किये परिचर्चा और उसके निष्कर्ष के लिए उन्हें बधाई दी एवम कार्यक्रम के दौरान उनके अनुशासन बनाये रखने एवम जीएनसीटी द्वारा दिये गए सारी सुविधाओ और व्यवस्था के लिए दिए  गए आभार के लिए धन्यवाद दिया। वरिष्ठ पत्रकार श्री सुशील पण्डित द्वारा तात्कालिक व्यवस्था पर कविता के द्वारा व्यंग्यात्मक प्रहार किया गया।

इश्के साथ ही श्री लव कुमार एवम सुश्री सुनीति सिंह द्वारा प्रतिभाग्यो को पुरस्कृत किया गया ।

From:sansaniindia


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महर्षि वाल्मीकि जयंती (GNCT Blog)




अश्विन मास की शरद पूर्णिमा को महर्षि वाल्मीकि का जन्मदिवस (वाल्मीकि जयंती) मनाया जाता है। इस साल वाल्मीकि जयंती अंग्रेजी महीनों के हिसाब से पांच अक्टूबर को होगी। वैदिक काल के प्रसिद्ध महर्षि वाल्मीकि ‘रामायण’ महाकाव्य के रचयिता के रूप में विश्व विख्यात है। महर्षि वाल्मीकि को न केवल संस्कृत बल्कि समस्त भाषाओं के महानतम कवियों में शुमार किया जाता है। महर्षि वाल्मीकि के जन्म के बारे में कोई ठोस जानकारी नहीं है। एक पौराणिक मान्यता के अनुसार उनका जन्म महर्षि कश्यप और अदिति के नौवें पुत्र वरुण और उनकी पत्नी चर्षणी के घर में हुआ। माना जाता है कि महर्षि भृगु वाल्मीकि के भाई थे। महर्षि वाल्मीकि का नाम उनके कड़े तप के कारण पड़ा था। एक समय ध्यान में मग्न वाल्मीकि के शरीर के चारों ओर दीमकों ने अपना घर बना लिया। जब वाल्मीकि जी की साधना पूरी हुई तो वो दीमकों के घर से बाहर निकले। दीमकों के घर को वाल्मीकि कहा जाता हैं इसलिए ही महर्षि भी वाल्मीकि के नाम से प्रसिद्ध हुए।

पूरे भारतवर्ष में वाल्मीकि जयंती श्रद्धा-भक्ति एवं हर्षोल्लास से मनाई जाती हैं। वाल्मीकि मंदिरों में श्रद्धालु आकर उनकी पूजा करते हैं। इस शुभावसर पर उनकी शोभा यात्रा भी निकली जाती हैं जिनमें झांकियों के साथ भक्तगण उनकी भक्ति में नाचते, गाते और झूमते हुए आगे बढ़ते हैं। इस अवसर पर ना केवल महर्षि वाल्मीकि बल्कि श्रीराम के भी भजन भी गाए जाते हैं। महर्षि वाल्मीकि ने रामायण महाकाव्य के सहारे प्रेम, तप, त्याग इत्यादि दर्शाते हुए हर मनुष्य को सदभावना के पथ पर चलने के लिए प्रेरित किया। इसलिए उनका ये दिन एक पर्व के रुप में मनाया जाता है।
एक पौराणिक कथा के अनुसार वाल्मीकि महर्षि बनने से पूर्व उनका नाम रत्नाकर था। रत्नाकर अपने परिवार के पालन के लिए लूटपाट किया करते थे। एक समय उनकी मुलाकात नारद मुनि से हुई। रत्नाकर ने उन्हें भी लूटने का प्रयास किया तो नारद मुनि ने उनसे पूछा कि आप ये काम क्यों करते हैं। रत्नाकर ने उत्तर दिया कि परिवार के पालन-पोषण के लिए वह ऐसा करते हैं। नारद मुनि ने रत्नाकर से कहा कि वो जो जिस परिवार के लिए अपराध कर रहे है और क्या वो उनके पापों का फल भोगने मे उनकी साझीदार होगा? असमंजस में पड़े रत्नाकर नारद मुनि को एक पेड़ से बांधकर अपने घर उस प्रश्न का उत्तर जानने हेतु पहुंचे। उन्हें जानकर बहुत ही निराशा हुई कि उनके परिवार का एक भी सदस्य उनके इस पाप का फल भोगने में साझीदार बनने को तैयार नहीं था। वाल्मीकि वापस लौटकर नारद के चरणों में गिर पड़े और उनसे ज्ञान देने के लिए कहा। नारद मुनि ने उन्हें राम नाम जपने की सलाह दी। यही रत्नाकर आगे चलकर महर्षि वाल्मीकि के रूप में विख्यात हुए।

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Friday, 29 September 2017

Gandhi Jayanti (GNCT Blog)



Gandhi Jayanti is a national festival celebrated in India to mark the occasion of the birthday of Mohandas Karamchand Gandhi, who is unofficially called the "Father of the Nation". It is celebrated on 2nd October. It is one of the four national holidays of the country. 

The United Nations General Assembly announced on 15 June 2007 that it adopted a resolution which declared that 2 October will be celebrated as the International Day of Non-Violence. It is celebrated every year.

Gandhi Jayanti is celebrated yearly on 2 October. It is one of the three official declared national holidays of India, observed in all of its states and union territories. Gandhi Jayanti is marked by prayer services and tributes all over India, Gandhi's memorial in New Delhi where he was cremated. Popular activities include prayer meetings, commemorative ceremonies in different cities by colleges, local government institutions and socio-political institutions.

Painting and essay competitions are conducted and best awards are granted for projects in schools and the community on themes of glorifying peace, non-violence and Gandhi's effort in Indian Freedom Struggle. Gandhi's favourite bhajan (Hindu devotional song), Raghupathi Raghava Rajaram, is usually sung in his memory.

From Wikipedia



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Happy Dussehra



दशहरा (विजयदशमी या आयुध-पूजा) हिन्दुओं का एक प्रमुख त्योहार है। अश्विन (क्वार) मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को इसका आयोजन होता है। भगवान राम ने इसी दिन रावण का वध किया था तथा देवी दुर्गा ने नौ रात्रि एवं दस दिन के युद्ध के उपरान्त महिषासुर पर विजय प्राप्त किया था। इसे असत्य पर सत्य की विजय के रूप में मनाया जाता है। इसीलिये इस दशमी को 'विजयादशमी' के नाम से जाना जाता है (दशहरा = दशहोरा = दसवीं तिथि)। दशहरा वर्ष की तीन अत्यन्त शुभ तिथियों में से एक है, अन्य दो हैं चैत्र शुक्ल की एवं कार्तिक शुक्ल की प्रतिपदा।

इस दिन लोग शस्त्र-पूजा करते हैं और नया कार्य प्रारम्भ करते हैं (जैसे अक्षर लेखन का आरम्भ, नया उद्योग आरम्भ, बीज बोना आदि)। ऐसा विश्वास है कि इस दिन जो कार्य आरम्भ किया जाता है उसमें विजय मिलती है। प्राचीन काल में राजा लोग इस दिन विजय की प्रार्थना कर रण-यात्रा के लिए प्रस्थान करते थे। इस दिन जगह-जगह मेले लगते हैं। रामलीला का आयोजन होता है। रावण का विशाल पुतला बनाकर उसे जलाया जाता है। दशहरा अथवा विजयदशमी भगवान राम की विजय के रूप में मनाया जाए अथवा दुर्गा पूजा के रूप में, दोनों ही रूपों में यह शक्ति-पूजा का पर्व है, शस्त्र पूजन की तिथि है। हर्ष और उल्लास तथा विजय का पर्व है। भारतीय संस्कृति वीरता की पूजक है, शौर्य की उपासक है। व्यक्ति और समाज के रक्त में वीरता प्रकट हो इसलिए दशहरे का उत्सव रखा गया है। दशहरा का पर्व दस प्रकार के पापों- काम, क्रोध, लोभ, मोह मद, मत्सर, अहंकार, आलस्य, हिंसा और चोरी के परित्याग की सद्प्रेरणा प्रदान करता है।

दशहरे का सांस्कृतिक पहलू भी है। भारत कृषि प्रधान देश है। जब किसान अपने खेत में सुनहरी फसल उगाकर अनाज रूपी संपत्ति घर लाता है तो उसके उल्लास और उमंग का पारावार नहीं रहता। इस प्रसन्नता के अवसर पर वह भगवान की कृपा को मानता है और उसे प्रकट करने के लिए वह उसका पूजन करता है। समस्त भारतवर्ष में यह पर्व विभिन्न प्रदेशों में विभिन्न प्रकार से मनाया जाता है। महाराष्ट्र में इस अवसर पर सिलंगण के नाम से सामाजिक महोत्सव के रूप में भी इसको मनाया जाता है। सायंकाल के समय पर सभी ग्रामीणजन सुंदर-सुंदर नव वस्त्रों से सुसज्जित होकर गाँव की सीमा पार कर शमी वृक्ष के पत्तों के रूप में 'स्वर्ण' लूटकर अपने ग्राम में वापस आते हैं। फिर उस स्वर्ण का परस्पर आदान-प्रदान किया जाता है।



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Wednesday, 27 September 2017

GNCT-Fresher Party Newspaper (GNCT Blog)


महा दुर्गा अष्टमी (GNCT Blog)



महाष्टमी को महादुर्गाअष्टमी के मां से भी जाना जाता है। महा अष्टमी दुर्गा पूजा के महत्वपूर्ण दिनों में से एक है। नौ दिनों के इस पर्व में मां के नौ रूपों की पूजा की जाती है। महा अष्टमी वाले दिन मां गौरी की पूजा की जाती है। मां गौरी भगवान शिव की पत्नी और भगवान गणेश की मां हैं। इस दिन पूजा पाठ और विशेषतौर पर कन्या पूजन किया जाता है। नौ रातों का समूह यानी नवरात्रे की शुरूआत अश्विन माह के शुक्ल पक्ष की पहली यानी तारीख 21 सितंबर से हो चुकी है और 30 सितंबर दशमी वाले दिन ये पूर्ण होंगे। सबसे पहले भगवान रामचंद्र ने समुंद्र के किनारे नौ दिन तक दुर्गा मां का पूजन किया था और इसके बाद लंका की तरफ प्रस्थान किया था। फिर उन्होंने युद्ध में विजय भी प्राप्त की थी, इसलिए दसवें दिन दशहरा मनाया जाता है और माना जाता है कि अधर्म की धर्म पर जीत, असत्‍य की सत्‍य पर जीत के लिए दसवें दिन दशहरा मनाते हैं। मां दुर्गा नवरात्रि के दौरान कैलाश छोड़कर धरती पर आकर रहती हैं। अष्टमी का दिन वो दिन होता है जब मां दुर्गा के नवरात्रि अंतिम चरण पर होते हैं। इस दिन छोटी कन्याओं को भोजन करवाया जाता है।

नवरात्रि के 8वें दिन की देवी मां महागौरी हैं। परम कृपालु मां महागौरी कठिन तपस्या कर गौरवर्ण को प्राप्त कर भगवती महागौरी के नाम से संपूर्ण विश्व में विख्यात हुईं। अष्टमी का अत्यन्त विशिष्ट महत्त्व है। आज के दिन ही आदिशक्ति भवानी का प्रादुर्भाव हुआ था। भगवती भवानी अजेय शक्तिशालिनी महानतम शक्ति हैं और यही कारण है कि इस अष्टमी को महाष्टमी कहा जाता है। महाष्टमी को भगवती के भक्त उनके दुर्गा, काली, भवानी, जगदम्बा, दवदुर्गा आदि रूपों की पूजा-आराधना करते हैं। अष्टमी के दिन कन्या पूजन करना श्रेष्ठ माना जाता है। कुछ लोग नवमी के दिन भी मां दुर्गा का पूजन करके कन्याओं का पूजन करते हैं और अपना व्रत खोलते हैं। लेकिन अगर अष्टमी के दिन कन्याओं का पूजन किया जाए तो मां महागौरी आपको विशेष आशीर्वाद देती हैं और आपकी सभी मनोकामनाएं पूरी करती हैं। महागौरी भक्तों को अभय, रूप व सौंदर्य प्रदान करने वाली है अर्थात शरीर में उत्पन्न अनेक प्रकार के विष व्याधियों का अंत कर जीवन को सुख-समृद्धि व आरोग्यता से पूर्ण करती हैं। मां की शास्त्रीय पद्धति से पूजा करने वाले सभी रोगों से मुक्त हो जाते हैं और धन-वैभव संपन्न होते हैं।


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Monday, 25 September 2017

GNCT GROUP FRESHERS-2017 (GNCT BLOG)

GNCT GROUP FRESHERS-2017


















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