Wednesday, 11 October 2017

विश्व के सबसे सुप्रसिद्ध और ऐतिहासिक आदर्श पत्र में से एक (चिट्ठी) (GNCT Blog)

Abraham Lincoln letter to his son’s teacher in Hindi

“अब्राहम लिंकन का पत्र……. पुत्र के शिक्षक के नाम…”

अब्राहम लिंकन अमेरिका के सोलहवें राष्ट्रपति थे। उन्होने अमेरिका को उसके सबसे बड़े संकट गृहयुद्ध (अमेरिकी गृहयुद्ध) से पार लगाया। अमेरिका में दास प्रथा के अंत का श्रेय लिंकन को ही जाता है इन्हें गुलामों का मुक्तिदाता भी कहा जाता है। लिंकन प्रारंभ से ही मेहनती, सरल स्वभाव के और बुद्धिमान थे। आजीविका चलाने और पढ़ाई के लिए उन्हें शुरू से ही काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा।
राष्ट्रपति लिंकन ने यह पत्र अपने बेटे के स्कूल प्रिंसिपल को लिखा था, यह पत्र एक ऐतिहासिक दस्तावेज है। लिंकन ने इसमें वे तमाम बातें लिखी थीं जो वे अपने बेटे को सिखाना चाहते थे। इस पत्र को आदर्श शिक्षक होने की कसौटी की नजीर के रूप में सालों से प्रस्तुत किया जाता रहा है। यह केवल एक छात्र व शिक्षक के सीखने-सिखाने तक सीमित नहीं हैं बल्कि इसका दायरा बहुत बड़ा है। पढि़ए…
सम्माननीय महोदय,
मैं अपने पुत्र को शिक्षा के लिए आपके हाथों सौंप रहा हूँ। आपसे मेरी अपेक्षा यह है कि इसे ऐसी शिक्षा दें जिससे यह सच्चा इंसान बन सके।
मैं जानता हूँ कि इस दुनिया में सारे लोग अच्छे और सच्चे नहीं हैं। यह बात मेरे बेटे को भी सीखनी होगी पर मैं चाहता हूँ कि आप उसे यह भी बताएँ कि हर बुरे आदमी के पास भी अच्छा हृदय होता है। हर स्वार्थी नेता के अंदर अच्छा लीडर बनने की क्षमता होती है। मैं चाहता हूँ कि आप उसे सिखाएँ कि हर दुश्मन के अंदर एक दोस्त बनने की संभावना भी होती है। ये बातें सीखने में उसे समय लगेगा, मैं जानता हूँ। पर आप उसे सिखाइए कि मेहनत से कमाया गया एक रुपया, सड़क पर मिलने वाले पाँच रुपए के नोट से ज्यादा कीमती होता है।
आप उसे बताइएगा कि दूसरों से जलन की भावना अपने मन में ना लाएँ। साथ ही यह भी कि खुलकर हँसते हुए भी शालीनता बरतना कितना जरूरी है। मुझे उम्मीद है कि आप उसे बता पाएँगे कि दूसरों को धमकाना और डराना कोई अच्छी बात नहीं है। यह काम करने से उसे दूर रहना चाहिए।
आप उसे किताबें पढ़ने के लिए तो कहिएगा ही, पर साथ ही उसे आकाश में उड़ते पक्षियों को धूप, धूप में हरे-भरे मैदानों में खिले-फूलों पर मँडराती तितलियों को निहारने की याद भी दिलाते रहिएगा। मैं समझता हूँ कि ये बातें उसके लिए ज्यादा काम की हैं।
मैं मानता हूँ कि स्कूल के दिनों में ही उसे यह बात भी सीखना होगी कि नकल करके पास होने से फेल होना अच्छा है। किसी बात पर चाहे दूसरे उसे गलत कहें, पर अपनी सच्ची बात पर कायम रहने का हुनर उसमें होना चाहिए। दयालु लोगों के साथ नम्रता से पेश आना और बुरे लोगों के साथ सख्ती से पेश आना चाहिए। दूसरों की सारी बातें सुनने के बाद उसमें से काम की चीजों का चुनाव उसे इन्हीं दिनों में सीखना होगा।
आप उसे बताना मत भूलिएगा कि उदासी को किस तरह प्रसन्नता में बदला जा सकता है। और उसे यह भी बताइएगा कि जब कभी रोने का मन करे तो रोने में शर्म बिल्कुल ना करे। मेरा सोचना है कि उसे खुद पर विश्वास होना चाहिए और दूसरों पर भी। तभी तो वह एक अच्छा इंसान बन पाएगा।
ये बातें बड़ी हैं और लंबी भी। पर आप इनमें से जितना भी उसे बता पाएँ उतना उसके लिए अच्छा होगा। फिर अभी मेरा बेटा बहुत छोटा है और बहुत प्यारा भी।
आपका,
अब्राहम लिंकन


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Wednesday, 4 October 2017

जी.एन. सी.टी.में आयोजित दो दिवसीय गौतमबुद्ध युवा संसद







जी.इन.सी.टी. ग्रेटर नोएडा में आयोजित दो दिवसीय गौतमबुद्ध संसद का समापन जिसमे देश भर के 51 संस्थानों से 300 छात्र छात्राओं ने युवा संसद में भाग लिया। महिला सुरक्षा, तीन तलाक, gst, नोटेबन्दी, रोमियो स्क्वाड आदि विषयों पर गहन चर्चा हुई ।
इस अवसर पर मुख्य अतिथि जेवर बिधायक श्री धीरेंद्र सिंह ने संसदीय कमेटियों के कार्यवाही का निरीक्षण किया साथ ही प्रतियोगिओ के द्वारा विभिन्न पेर दिए जारहे विचारो को प्रोत्साहित करते हुए कई सुझाव दिए तथा उनके द्वारा दिये गए विवेचओ कि प्रशांसा की।उसके पश्चात निदेशक डॉ राजेश पाठक ने उन्हें प्रतीक चिन्ह और गुलदस्ता देकर उनका अभिवादन किया गया।

समापन समारोह में मे विशेष अतिथि वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक गौतमबुद्ध नगर श्री लव कुमार एवम पुलिस अधीक्षक (ग्रामीण) सूश्री सुनीति सिंह ने लोगो से खुद के अंदर बदलाव लाने के लिए प्रेरित किया साथ पुलिस द्वारा किये जारहे सुरक्षा के उपायों का विस्तार से प्रकाश डाला और लोगों को पुलिस द्वारा निरंतर सहयोग का वादा किया।सुश्री सुनीति सिंह ने औरतो के देश की विकास में योगदान और  सशक्त महिला होने से समाज पर उसके अच्छे परिणाम की विवेचना किया।
ततपशचात वरिष्ठ राजनीतिक विचारक श्री शेर सिंह ने जनता और नेता के दोनों की जिम्मेदारियों को समझाया।

निदेशक डॉ राजेश पाठक ने परिभागियों द्वारा विभिन्न विषयों पे ईमानदारी से किये परिचर्चा और उसके निष्कर्ष के लिए उन्हें बधाई दी एवम कार्यक्रम के दौरान उनके अनुशासन बनाये रखने एवम जीएनसीटी द्वारा दिये गए सारी सुविधाओ और व्यवस्था के लिए दिए  गए आभार के लिए धन्यवाद दिया। वरिष्ठ पत्रकार श्री सुशील पण्डित द्वारा तात्कालिक व्यवस्था पर कविता के द्वारा व्यंग्यात्मक प्रहार किया गया।

इश्के साथ ही श्री लव कुमार एवम सुश्री सुनीति सिंह द्वारा प्रतिभाग्यो को पुरस्कृत किया गया ।

From:sansaniindia


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महर्षि वाल्मीकि जयंती (GNCT Blog)




अश्विन मास की शरद पूर्णिमा को महर्षि वाल्मीकि का जन्मदिवस (वाल्मीकि जयंती) मनाया जाता है। इस साल वाल्मीकि जयंती अंग्रेजी महीनों के हिसाब से पांच अक्टूबर को होगी। वैदिक काल के प्रसिद्ध महर्षि वाल्मीकि ‘रामायण’ महाकाव्य के रचयिता के रूप में विश्व विख्यात है। महर्षि वाल्मीकि को न केवल संस्कृत बल्कि समस्त भाषाओं के महानतम कवियों में शुमार किया जाता है। महर्षि वाल्मीकि के जन्म के बारे में कोई ठोस जानकारी नहीं है। एक पौराणिक मान्यता के अनुसार उनका जन्म महर्षि कश्यप और अदिति के नौवें पुत्र वरुण और उनकी पत्नी चर्षणी के घर में हुआ। माना जाता है कि महर्षि भृगु वाल्मीकि के भाई थे। महर्षि वाल्मीकि का नाम उनके कड़े तप के कारण पड़ा था। एक समय ध्यान में मग्न वाल्मीकि के शरीर के चारों ओर दीमकों ने अपना घर बना लिया। जब वाल्मीकि जी की साधना पूरी हुई तो वो दीमकों के घर से बाहर निकले। दीमकों के घर को वाल्मीकि कहा जाता हैं इसलिए ही महर्षि भी वाल्मीकि के नाम से प्रसिद्ध हुए।

पूरे भारतवर्ष में वाल्मीकि जयंती श्रद्धा-भक्ति एवं हर्षोल्लास से मनाई जाती हैं। वाल्मीकि मंदिरों में श्रद्धालु आकर उनकी पूजा करते हैं। इस शुभावसर पर उनकी शोभा यात्रा भी निकली जाती हैं जिनमें झांकियों के साथ भक्तगण उनकी भक्ति में नाचते, गाते और झूमते हुए आगे बढ़ते हैं। इस अवसर पर ना केवल महर्षि वाल्मीकि बल्कि श्रीराम के भी भजन भी गाए जाते हैं। महर्षि वाल्मीकि ने रामायण महाकाव्य के सहारे प्रेम, तप, त्याग इत्यादि दर्शाते हुए हर मनुष्य को सदभावना के पथ पर चलने के लिए प्रेरित किया। इसलिए उनका ये दिन एक पर्व के रुप में मनाया जाता है।
एक पौराणिक कथा के अनुसार वाल्मीकि महर्षि बनने से पूर्व उनका नाम रत्नाकर था। रत्नाकर अपने परिवार के पालन के लिए लूटपाट किया करते थे। एक समय उनकी मुलाकात नारद मुनि से हुई। रत्नाकर ने उन्हें भी लूटने का प्रयास किया तो नारद मुनि ने उनसे पूछा कि आप ये काम क्यों करते हैं। रत्नाकर ने उत्तर दिया कि परिवार के पालन-पोषण के लिए वह ऐसा करते हैं। नारद मुनि ने रत्नाकर से कहा कि वो जो जिस परिवार के लिए अपराध कर रहे है और क्या वो उनके पापों का फल भोगने मे उनकी साझीदार होगा? असमंजस में पड़े रत्नाकर नारद मुनि को एक पेड़ से बांधकर अपने घर उस प्रश्न का उत्तर जानने हेतु पहुंचे। उन्हें जानकर बहुत ही निराशा हुई कि उनके परिवार का एक भी सदस्य उनके इस पाप का फल भोगने में साझीदार बनने को तैयार नहीं था। वाल्मीकि वापस लौटकर नारद के चरणों में गिर पड़े और उनसे ज्ञान देने के लिए कहा। नारद मुनि ने उन्हें राम नाम जपने की सलाह दी। यही रत्नाकर आगे चलकर महर्षि वाल्मीकि के रूप में विख्यात हुए।

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Friday, 29 September 2017

Gandhi Jayanti (GNCT Blog)



Gandhi Jayanti is a national festival celebrated in India to mark the occasion of the birthday of Mohandas Karamchand Gandhi, who is unofficially called the "Father of the Nation". It is celebrated on 2nd October. It is one of the four national holidays of the country. 

The United Nations General Assembly announced on 15 June 2007 that it adopted a resolution which declared that 2 October will be celebrated as the International Day of Non-Violence. It is celebrated every year.

Gandhi Jayanti is celebrated yearly on 2 October. It is one of the three official declared national holidays of India, observed in all of its states and union territories. Gandhi Jayanti is marked by prayer services and tributes all over India, Gandhi's memorial in New Delhi where he was cremated. Popular activities include prayer meetings, commemorative ceremonies in different cities by colleges, local government institutions and socio-political institutions.

Painting and essay competitions are conducted and best awards are granted for projects in schools and the community on themes of glorifying peace, non-violence and Gandhi's effort in Indian Freedom Struggle. Gandhi's favourite bhajan (Hindu devotional song), Raghupathi Raghava Rajaram, is usually sung in his memory.

From Wikipedia



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Happy Dussehra



दशहरा (विजयदशमी या आयुध-पूजा) हिन्दुओं का एक प्रमुख त्योहार है। अश्विन (क्वार) मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को इसका आयोजन होता है। भगवान राम ने इसी दिन रावण का वध किया था तथा देवी दुर्गा ने नौ रात्रि एवं दस दिन के युद्ध के उपरान्त महिषासुर पर विजय प्राप्त किया था। इसे असत्य पर सत्य की विजय के रूप में मनाया जाता है। इसीलिये इस दशमी को 'विजयादशमी' के नाम से जाना जाता है (दशहरा = दशहोरा = दसवीं तिथि)। दशहरा वर्ष की तीन अत्यन्त शुभ तिथियों में से एक है, अन्य दो हैं चैत्र शुक्ल की एवं कार्तिक शुक्ल की प्रतिपदा।

इस दिन लोग शस्त्र-पूजा करते हैं और नया कार्य प्रारम्भ करते हैं (जैसे अक्षर लेखन का आरम्भ, नया उद्योग आरम्भ, बीज बोना आदि)। ऐसा विश्वास है कि इस दिन जो कार्य आरम्भ किया जाता है उसमें विजय मिलती है। प्राचीन काल में राजा लोग इस दिन विजय की प्रार्थना कर रण-यात्रा के लिए प्रस्थान करते थे। इस दिन जगह-जगह मेले लगते हैं। रामलीला का आयोजन होता है। रावण का विशाल पुतला बनाकर उसे जलाया जाता है। दशहरा अथवा विजयदशमी भगवान राम की विजय के रूप में मनाया जाए अथवा दुर्गा पूजा के रूप में, दोनों ही रूपों में यह शक्ति-पूजा का पर्व है, शस्त्र पूजन की तिथि है। हर्ष और उल्लास तथा विजय का पर्व है। भारतीय संस्कृति वीरता की पूजक है, शौर्य की उपासक है। व्यक्ति और समाज के रक्त में वीरता प्रकट हो इसलिए दशहरे का उत्सव रखा गया है। दशहरा का पर्व दस प्रकार के पापों- काम, क्रोध, लोभ, मोह मद, मत्सर, अहंकार, आलस्य, हिंसा और चोरी के परित्याग की सद्प्रेरणा प्रदान करता है।

दशहरे का सांस्कृतिक पहलू भी है। भारत कृषि प्रधान देश है। जब किसान अपने खेत में सुनहरी फसल उगाकर अनाज रूपी संपत्ति घर लाता है तो उसके उल्लास और उमंग का पारावार नहीं रहता। इस प्रसन्नता के अवसर पर वह भगवान की कृपा को मानता है और उसे प्रकट करने के लिए वह उसका पूजन करता है। समस्त भारतवर्ष में यह पर्व विभिन्न प्रदेशों में विभिन्न प्रकार से मनाया जाता है। महाराष्ट्र में इस अवसर पर सिलंगण के नाम से सामाजिक महोत्सव के रूप में भी इसको मनाया जाता है। सायंकाल के समय पर सभी ग्रामीणजन सुंदर-सुंदर नव वस्त्रों से सुसज्जित होकर गाँव की सीमा पार कर शमी वृक्ष के पत्तों के रूप में 'स्वर्ण' लूटकर अपने ग्राम में वापस आते हैं। फिर उस स्वर्ण का परस्पर आदान-प्रदान किया जाता है।



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Wednesday, 27 September 2017

GNCT-Fresher Party Newspaper (GNCT Blog)


महा दुर्गा अष्टमी (GNCT Blog)



महाष्टमी को महादुर्गाअष्टमी के मां से भी जाना जाता है। महा अष्टमी दुर्गा पूजा के महत्वपूर्ण दिनों में से एक है। नौ दिनों के इस पर्व में मां के नौ रूपों की पूजा की जाती है। महा अष्टमी वाले दिन मां गौरी की पूजा की जाती है। मां गौरी भगवान शिव की पत्नी और भगवान गणेश की मां हैं। इस दिन पूजा पाठ और विशेषतौर पर कन्या पूजन किया जाता है। नौ रातों का समूह यानी नवरात्रे की शुरूआत अश्विन माह के शुक्ल पक्ष की पहली यानी तारीख 21 सितंबर से हो चुकी है और 30 सितंबर दशमी वाले दिन ये पूर्ण होंगे। सबसे पहले भगवान रामचंद्र ने समुंद्र के किनारे नौ दिन तक दुर्गा मां का पूजन किया था और इसके बाद लंका की तरफ प्रस्थान किया था। फिर उन्होंने युद्ध में विजय भी प्राप्त की थी, इसलिए दसवें दिन दशहरा मनाया जाता है और माना जाता है कि अधर्म की धर्म पर जीत, असत्‍य की सत्‍य पर जीत के लिए दसवें दिन दशहरा मनाते हैं। मां दुर्गा नवरात्रि के दौरान कैलाश छोड़कर धरती पर आकर रहती हैं। अष्टमी का दिन वो दिन होता है जब मां दुर्गा के नवरात्रि अंतिम चरण पर होते हैं। इस दिन छोटी कन्याओं को भोजन करवाया जाता है।

नवरात्रि के 8वें दिन की देवी मां महागौरी हैं। परम कृपालु मां महागौरी कठिन तपस्या कर गौरवर्ण को प्राप्त कर भगवती महागौरी के नाम से संपूर्ण विश्व में विख्यात हुईं। अष्टमी का अत्यन्त विशिष्ट महत्त्व है। आज के दिन ही आदिशक्ति भवानी का प्रादुर्भाव हुआ था। भगवती भवानी अजेय शक्तिशालिनी महानतम शक्ति हैं और यही कारण है कि इस अष्टमी को महाष्टमी कहा जाता है। महाष्टमी को भगवती के भक्त उनके दुर्गा, काली, भवानी, जगदम्बा, दवदुर्गा आदि रूपों की पूजा-आराधना करते हैं। अष्टमी के दिन कन्या पूजन करना श्रेष्ठ माना जाता है। कुछ लोग नवमी के दिन भी मां दुर्गा का पूजन करके कन्याओं का पूजन करते हैं और अपना व्रत खोलते हैं। लेकिन अगर अष्टमी के दिन कन्याओं का पूजन किया जाए तो मां महागौरी आपको विशेष आशीर्वाद देती हैं और आपकी सभी मनोकामनाएं पूरी करती हैं। महागौरी भक्तों को अभय, रूप व सौंदर्य प्रदान करने वाली है अर्थात शरीर में उत्पन्न अनेक प्रकार के विष व्याधियों का अंत कर जीवन को सुख-समृद्धि व आरोग्यता से पूर्ण करती हैं। मां की शास्त्रीय पद्धति से पूजा करने वाले सभी रोगों से मुक्त हो जाते हैं और धन-वैभव संपन्न होते हैं।


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