Wednesday, 20 September 2017

महाराजा अग्रसेन जयंती - (GNCT Blog)




महाराजा अग्रसेन एक पौराणिक कर्मयोगी लोकनायक, समाजवाद के प्रणेता, युग पुरुष, तपस्वी, राम राज्य के समर्थक एवं महादानी थे।
इनका जन्म द्वापर युग के अंत व कलयुग के प्रारंभ में हुआ था। वें भगवान श्री कृष्ण के समकालीन थे। महाराजा अग्रसेन का जन्म अश्विन शुक्ल प्रतिपदा हुआ, जिसे अग्रसेन जयंती के रूप में मनाया जाता है। नवरात्रि के प्रथम दिवस को अग्रसेन महाराज जयंती के रूप में मनाया जाता हैं।
अग्रसेन जयंती पर अग्रसेन के वंशज समुदाय द्वारा अग्रसेन महाराज की भव्य झांकी व शोभायात्रा नकाली जाती हैं और अग्रसेन महाराज का पूजन पाठ, आरती किया जाता हैं।

॥ श्री अग्रभागवत महात्म ॥ ॠृषि गण प्रदर्शित

 श्री अग्र भागवत ( श्री अग्रोपाख्यानं ) की कथा, मरण को उद्यत दिग्भ्रांत, अशांत परीक्षितपुत्र महाराजा जनमेजय को, लोकधर्म साधना का मार्ग प्रशस्त करने की अभिप्रेरणा हेतु - भगवान वेद व्यास के प्रधान शिष्य महर्षि जैमिनी जी द्वारा,सुनाई गई। परिणाम स्वरूप - अशांत जनमेजय ने परम शांति अर्जित कर, मानव धर्म धारण कर - लोककीर्ति तथा परम मोक्ष दोनों ही प्राप्त किये। 
 मॉं महालक्ष्मी की कृपा से समन्वित, भगवतस्वरूप इस परमपूज्य ग्रन्थ की ॠृषियों ने महत्ता दर्शाते हुए स्वयं वंदना की है।
ऋषय ऊचु: महालक्ष्मीवर इव ग्रन्थो मान्येतिहासक:। तं कश्चित् पुण्ययोगेन प्राप्नोति पुरुषोत्तम: ॥
  ॠृषि गण कहते हैं- महालक्ष्मी के वरदान से समन्वित होने के कारण स्वरूप, श्री अग्रसेन का यह उपाख्यान ( पुरुषार्थ गाथा ) सभी आख्यानों में सम्मानीय, श्रेयप्रदाता, और मंगलकारी है। जिसे कोई पुरुषश्रेष्ठ पुण्यों के योग से प्राप्त करता है। 
अग्राख्यानं भवेद्यत्र तत्र श्री: सवसु: स्थिरा। कृत्वाभिषेकमेतस्य तत: पापै: प्रमुच्यते ॥
 ॠृषि गणकहते हैं - श्री अग्रसेन का यह आख्यान (पुरुषार्थ गाथा) जहां रहता है, वहां महालक्ष्मी सुस्थिर होकर विराजमान रहती। अर्थात स्थाई निवास करती हैं। इसका विधिवत अभिषेक करने वाले, सभी पापों से विमुक्त हो जाते हैं। 
ग्रंथदर्शन योगोऽयं सर्वलक्ष्मीफलप्रद:। दु:खानि चास्य नश्यन्ति सौख्यं सर्वत्र विन्दति ॥
 ॠृषि गणों ने कहा- श्री अग्रसेन के इस आख्यान (पुरुषार्थ गाथा) का सौभाग्य से दर्शन प्राप्त होना, महालक्ष्मीके , अर्थ-धर्म-काम मोक्ष सभी फलों का प्रदायक है। इसके दर्शन कर लेने वालों के, सभी दुखों का विनाश हो जाता है, और सर्वत्र सुखादि की प्रतीति होती है। 
दर्शनेनालमस्यात्र ह्यभिषेकेण किं पुन:। विलयं यान्ति पापानि हिमवद् भास्करोदये ॥
 ॠृषि गणों ने कहा - जिसके दर्शन मात्र से, सभी पापों का इसप्रकार अन्त हो जाता है, जैसे सूर्य के उदित होने से बर्फ पिघल जाती है। फिर जलाभिषेक के महत्व की तो बात ही क्या ? अर्थात अनन्त महात्म है। 
प्रशस्यां‌गोपां‌गयुक्त: कल्पवृक्षस्वरूपिणे। महासिध्दियुत श्रीमद्‌ग्रोपाख्यान ते नम: ॥
 ॠृषिगण कहते हैं - श्री अग्रसेन के आदर्श जीवन चरित्र के,सभी उत्तमोत्तम अंगों तथा उपांगों से युक्त, कल्पवृक्ष के समान , आठों सिद्धियों से संयुक्त,श्री अग्रसेन के इस आख्यान (पुरुषार्थ गाथा) को, नमन करते हुए ,हम बारम्बार प्रणाम करते हैं।
यह शुभकारी आख्यान जगत में सबके लिये कल्याणकारी हो।
From : Wikipedia



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International Peace Day-21st Sep (GNCT Blog)


The International Day of Peace ("Peace Day") is observed around the world each year on 21 September. Established in 1981 by unanimous United Nations resolution, Peace Day provides a globally shared date for all humanity to commit to Peace above all differences and to contribute to building a Culture of Peace.



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नवरात्रि



नवरात्रि एक हिंदू पर्व है। नवरात्रि एक संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ होता है 'नौ रातें'। इन नौ रातों और दस दिनों के दौरान, शक्ति / देवी के नौ रूपों की पूजा की जाती है। दसवाँ दिन दशहरा के नाम से प्रसिद्ध है। नवरात्रि वर्ष में चार बार आता है। पौष, चैत्र,आषाढ,अश्विन प्रतिपदा से नवमी तक मनाया जाता है। नवरात्रि के नौ रातों में तीन देवियों - महालक्ष्मी, महासरस्वती या सरस्वती और दुर्गा के नौ स्वरुपों की पूजा होती है जिन्हें नवदुर्गा कहते हैं। इन नौ रातों और दस दिनों के दौरान, शक्ति / देवी के नौ रूपों की पूजा की जाती है। दुर्गा का मतलब जीवन के दुख कॊ हटानेवाली होता है। नवरात्रि एक महत्वपूर्ण प्रमुख त्योहार है जिसे पूरे भारत में महान उत्साह के साथ मनाया जाता है।
नौ देवियाँ है :-
  • शैलपुत्री - इसका अर्थ- पहाड़ों की पुत्री होता है।
  • ब्रह्मचारिणी - इसका अर्थ- ब्रह्मचारीणी।
  • चंद्रघंटा - इसका अर्थ- चाँद की तरह चमकने वाली।
  • कूष्माण्डा - इसका अर्थ- पूरा जगत उनके पैर में है।
  • स्कंदमाता - इसका अर्थ- कार्तिक स्वामी की माता।
  • कात्यायनी - इसका अर्थ- कात्यायन आश्रम में जन्मि।
  • कालरात्रि - इसका अर्थ- काल का नाश करने वली।
  • महागौरी - इसका अर्थ- सफेद रंग वाली मां।
  • सिद्धिदात्री - इसका अर्थ- सर्व सिद्धि देने वाली।
शक्ति की उपासना का पर्व शारदीय नवरात्र प्रतिपदा से नवमी तक निश्चित नौ तिथि, नौ नक्षत्र, नौ शक्तियों की नवधा भक्ति के साथ सनातन काल से मनाया जा रहा है। सर्वप्रथम श्रीरामचंद्रजी ने इस शारदीय नवरात्रि पूजा का प्रारंभ समुद्र तट पर किया था और उसके बाद दसवें दिन लंका विजय के लिए प्रस्थान किया और विजय प्राप्त की। तब से असत्य, अधर्म पर सत्य, धर्म की जीत का पर्व दशहरा मनाया जाने लगा। आदिशक्ति के हर रूप की नवरात्र के नौ दिनों में क्रमशः अलग-अलग पूजा की जाती है। माँ दुर्गा की नौवीं शक्ति का नाम सिद्धिदात्री है। ये सभी प्रकार की सिद्धियाँ देने वाली हैं। इनका वाहन सिंह है और कमल पुष्प पर ही आसीन होती हैं। नवरात्रि के नौवें दिन इनकी उपासना की जाती है।
From: wikipedia


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Friday, 15 September 2017

International Day for the Preservation of the Ozone Layer 2017



International Day for the Preservation of the Ozone Layer 2017

The United Nations’ International Day for the Preservation of the Ozone Layer is celebrated on the 16th September every year. Commemorating the 1987 signing of the Montreal Protocol on Substances that Deplete the Ozone Layer, the day advocates activities that create awareness on topics related to climate change and ozone depletion.

The ozone layer, a fragile shield of gas, protects the Earth from the harmful portion of the sun's rays, thus helping to preserve life on the planet. As such, it is paramount that we protect the ozone layer from harmful substances such as HCFCs (hydrochlorofluorocarbons). HCFCs are both ozone-depleting substances and powerful greenhouse gases that contribute to the thinning of the ozone layer. Nearly 2,000 times more potent than carbon dioxide in adding to global warming, the successful reduction of HCFC emissions remains one of the UN’s greatest challenges.

However, the gradual phasing out of controlled uses of ozone-depleting substances has not only helped protect the ozone layer for this and future generations, but has also contributed significantly to global efforts to address climate change. As a result, it has protected human health and ecosystems by limiting the harmful ultraviolet radiation from reaching Earth.


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Thursday, 14 September 2017

15 सितंबर - इंजीनियर डे



आज पूरे भारत में इंजीनियर्स डे मनाया जा रहा है। क्या आपको पता है ये आज ही क्यों मनाया जाता है? तो हम आपको बता दें की इस दिन महान भारतीय इंजीनियर भारत रत्न सर एम विश्वेश्वरय्या का जन्म हुआ था। इनकी याद में हर साल 15 सितंबर को इंजीनियर डे मनाया जाता है। 


भारत एक विकासशील देश है। आज यहां विभिन्न इंजीनिरिंग कॉलेजेस खुल चुके हैं, जहां से देश के नए नए साइंटिस्ट पैदा हो रहे हैं। आपको बता दें की भारत आईटी के क्षेत्र में दुनिया का अग्रणी देश है। ऐसे में भारत में आईटी इंजीनीर्स की भारी संख्या है। इसके साथ ही इंजिनियरिंग के दूसरे कोर्स भी भारत युवाओं का रोजगार के तौर पर बड़ी पसंद हैं।

कौन थे एम विश्वेश्वरय्या
15 सितंबर 1860 को जन्मे एम विश्वेश्वरय्या की जनस्थली मैसूर (कर्नाटक) है। बचपन से ही ये पढ़ाई में बेहद होनहार थे। भारत रत्न से सम्मानित विश्वेश्वरय्या ने मैसूर सरकार की मदद से इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए पूना के साइंस कॉलेज में दाखिला लिया। इसके बाद वो महाराष्ट्र सरकार में नासिक में सहायक इंजीनियर के पद पर नियुक्त हो गए। सर एमवी के नाम से मशहूर विश्वेश्वरय्या के प्रयासों से ही कृष्णराजसागर बांध, भद्रावती आयरन एंड स्टील व‌र्क्स, मैसूर संदल ऑयल एंड सोप फैक्टरी, मैसूर विश्वविद्यालय, बैंक ऑफ मैसूर का निर्माण हो पाया।


शिक्षा को देते थे महत्व 
सर एमवी बचपन से ही शिक्षा को बहुत महत्व देते थे उनके मैसूर राज्य के दीवान रहते में स्कूलों की संख्या को 4,500 से बढ़ाकर 10,500 हो गई। इसके साथ ही विद्यार्थियों की संख्या भी 1,40,000 से 3,66,000 तक पहुंच गई। मैसूर में लड़कियों के लिए अलग हॉस्टल और पहला फ‌र्स्ट ग्रेड कॉलेज (महारानी कॉलेज) खुलवाने का श्रेय भी विश्वेश्वरैया को ही जाता है। उन दिनों मैसूर के सभी कॉलेज मद्रास विश्वविद्यालय से संबद्ध थे। उनके ही अथक प्रयासों के चलते मैसूर विश्वविद्यालय की स्थापना हुई जो देश के सबसे पुराने विश्वविद्यालयों में से एक है। उनके कामों को देखते हुए साल 1955 में उन्हें सर्वोच्च भारतीय सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया। सार्वजनिक जीवन में बतौर इंजीनियर उनके योगदान के लिए भारत हर साल उनके जन्मदिन को इंजीनियर डे के रूप में मनाता है।


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Wednesday, 13 September 2017

हिंदी दिवस - राष्ट्रभाषा





हमारे भारत देश में हर साल हिंदी दिवस 14 सितम्बर को ही मनाया जाता है, हिंदी भाषा के इतिहासिक पलो को याद कर लोग इस दिवस को मनाते है। 14 सितम्बर 1949 को ही हिंदी को देवनागरी लिपि में भारत की कार्यकारी और राष्ट्रभाषा का दर्जा अधिकारिक रूप से दिया गया था और तभी से देश में 14 सितम्बर का दिन हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है।

भले ही आज इंग्लिश भाषा का ज्ञान होना जरुरी है लेकिन सफलता पाने के लिये हमें अपनी राष्ट्रभाषा को कभी नही भूलना चाहिये। क्योकि हमारे देश की भाषा और हमारी संस्कृति हमारे लिये बहुत मायने रखती है।
किसी भी आर्थिक रूप से प्रगत देश की राष्ट्रभाषा वहाँ के लोगो के साथ-साथ हमेशा तेज़ी से बढती जाती है क्योकि वे लोग जानते है की किसी भी बाहरी देश में उनकी राष्ट्रभाषा और संस्कृति ही उनकी पहचान बनने वाली है। उसी तरह से हम भारतीयों को भी हमारी राष्ट्रभाषा को महत्त्व देना चाहिये। क्योकि हिंदी भाषा ही हमारे महान प्राचीन इतिहास को उजागर करती है और वही हमारी पहचान है।


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Sunday, 10 September 2017

PM Narendra Modi to Mark 125th Anniversary of Swami Vivekananda's Chicago Speech

Prime Minister Narendra Modi will address a students' convention on Monday to mark the 125th anniversary of Swami Vivekananda's Chicago address and BJP ideologue Deendayal Upadhyaya's centenary celebrations. The theme of the convention is 'Young India, New India'.



Here's the full text of his opening and closing address:
Opening Address - Chicago, Sept 11, 1893
Sisters and Brothers of America,
It fills my heart with joy unspeakable to rise in response to the warm and cordial welcome which you have given us. I thank you in the name of the most ancient order of monks in the world; I thank you in the name of the mother of religions, and I thank you in the name of millions and millions of Hindu people of all classes and sects.
My thanks, also, to some of the speakers on this platform who, referring to the delegates from the Orient, have told you that these men from far-off nations may well claim the honor of bearing to different lands the idea of toleration. I am proud to belong to a religion which has taught the world both tolerance and universal acceptance.
We believe not only in universal toleration, but we accept all religions as true. I am proud to belong to a nation which has sheltered the persecuted and the refugees of all religions and all nations of the earth. I am proud to tell you that we have gathered in our bosom the purest remnant of the Israelites, who came to Southern India and took refuge with us in the very year in which their holy temple was shattered to pieces by Roman tyranny. I am proud to belong to the religion which has sheltered and is still fostering the remnant of the grand Zoroastrian nation. I will quote to you, brethren, a few lines from a hymn which I remember to have repeated from my earliest boyhood, which is every day repeated by millions of human beings: "As the different streams having their sources in different paths which men take through different tendencies, various though they appear, crooked or straight, all lead to Thee."
The present convention, which is one of the most august assemblies ever held, is in itself a vindication, a declaration to the world of the wonderful doctrine preached in the Gita: "Whosoever comes to Me, through whatsoever form, I reach him; all men are struggling through paths which in the end lead to me." Sectarianism, bigotry, and its horrible descendant, fanaticism, have long possessed this beautiful earth.
They have filled the earth with violence, drenched it often and often with human blood, destroyed civilization and sent whole nations to despair. Had it not been for these horrible demons, human society would be far more advanced than it is now. But their time is come; and I fervently hope that the bell that tolled this morning in honor of this convention may be the death-knell of all fanaticism, of all persecutions with the sword or with the pen, and of all uncharitable feelings between persons wending their way to the same goal.
Concluding Address -- Chicago, September 27, 1893
The World's Parliament of Religions has become an accomplished fact, and the merciful Father has helped those who labored to bring it into existence, and crowned with success their most unselfish labor.My thanks to those noble souls whose large hearts and love of truth first dreamed this wonderful dream and then realized it. My thanks to the shower of liberal sentiments that has overflowed this platform. My thanks to this enlightened audience for their uniform kindness to me and for their appreciation of every thought that tends to smooth the friction of religions. A few jarring notes were heard from time to time in this harmony. My special thanks to them, for they have, by their striking contrast, made general harmony the sweeter.
Much has been said of the common ground of religious unity. I am not going just now to venture my own theory. But if any one here hopes that this unity will come by the triumph of any one of the religions and the destruction of the others, to him I say, "Brother, yours is an impossible hope." Do I wish that the Christian would become Hindu? God forbid. Do I wish that the Hindu or Buddhist would become Christian? God forbid.
The seed is put in the ground, and earth and air and water are placed around it. Does the seed become the earth, or the air, or the water? No. It becomes a plant. It develops after the law of its own growth, assimilates the air, the earth, and the water, converts them into plant substance, and grows into a plant.
Similar is the case with religion. The Christian is not to become a Hindu or a Buddhist, nor a Hindu or a Buddhist to become a Christian. But each must assimilate the spirit of the others and yet preserve his individuality and grow according to his own law of growth.
If the Parliament of Religions has shown anything to the world, it is this: It has proved to the world that holiness, purity and charity are not the exclusive possessions of any church in the world, and that every system has produced men and women of the most exalted character.
In the face of this evidence, if anybody dreams of the exclusive survival of his own religion and the destruction of the others, I pity him from the bottom of my heart, and point out to him that upon the banner of every religion will soon be written in spite of resistance: "Help and not fight," "Assimilation and not Destruction," "Harmony and Peace and not Dissension."